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सामयिक मुद्दे पर लिखी गयी ब्यंगात्मक रचनाएं

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क्या कहें साहब !!

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हम अपने देश के हालात ! क्या कहें साहब !!

दिल में जलते हुये जज़्बात! क्या कहें साहब !!

इतने सालों की, जम्हूरियत का, हासिल क्या?

झूठे वादों की है सौगात ! क्या कहें साहब !!

इतने सालों में, बस मोहरे सी बनी है जनता,

ये सियासत की है बिसात! क्या कहें साहब !!

बच्चियाँ गर्भ में ही मार कर, नौरात्रि मनाएँ,

चढ़ती  दहेज  से बारात ! क्या कहें साहब !!

सिमट चुकी है शहर तक ही, तरक्की की चमक,

और गांवों की सियह-रात ! क्या कहें साहब !!

भूंख,  महँगाई,  भ्रष्टाचार, हर तरफ फैले,

ये सुलगते से सवालात! क्या कहें साहब !!

कहीं तो कर्ज तले, दब के किसान मरते हैं,

कहीं पैसों की है बरसात! क्या कहें साहब !!

अब शहीदों के तो, सब घर भी हड़प जाते हैं,

नेता, बाबाओं की औकात! क्या कहें साहब !!

आज भी योग्यता को, जातियों से हम मापें,

सबकी पहचान बनी जात! क्या कहें साहब !!

सुनाऊँ चीख किसे, ‘जानी’ सभी बहरों में,

ना करें देश की हम बात! चुप रहें साहब !!

हम अपने देश के हालात ! क्या कहें साहब !!

दिल में जलते हुये जज़्बात! क्या कहें साहब !!

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11 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

ajaydubeydeoria के द्वारा
May 12, 2012

कुछ न कुछ तो कहना ही पड़ेगा , जानी साहब. कब तक बहरे बन कर बैठे रहेंगे. कब तक अपने जज्बातों को मरते हुए देखेंगे. आखिर कब तक. देश के हालात को व्यक्त करती हुयी सुन्दर प्रस्तुति. बधाई.

Piyush Kumar Pant के द्वारा
May 12, 2012

बच्चियाँ गर्भ में ही मार कर, नौरात्रि मनाएँ, चढ़ती दहेज से बारात ! क्या कहें साहब !! कविता के माध्यम से अच्छे प्रश्न मंच पर रखे है……

shashibhushan1959 के द्वारा
May 12, 2012

आदरणीय मनोज जी, सादर ! बहुत खूबसूरत रचना ! बेहतरीन ! एक-एक पंक्ति सार्थक ! बधाई !

May 12, 2012

आपने इअतना कुछ कह दिया….. अब हम सोच रहे हैं कि अब हम क्या कहे साहब………………..!

rekhafbd के द्वारा
May 12, 2012

मनोज जी ,हम अपने देश के हालात क्या कहें साहब . धरातल में जा रहा देश ,क्या करे साहब ,बढिया प्रस्तुति ,बधाई

yogi sarswat के द्वारा
May 12, 2012

आज भी योग्यता को, जातियों से हम मापें, सबकी पहचान बनी जात! क्या कहें साहब !! सुनाऊँ चीख किसे, ‘जानी’ सभी बहरों में, ना करें देश की हम बात! चुप रहें साहब !! हम अपने देश के हालात ! क्या कहें साहब !! दिल में जलते हुये जज़्बात! क्या कहें साहब !! श्री मनोज जोहनी जी , सादर ! ये वाली आपकी ग़ज़ल मैंने आपकी वेबसाइट पर पहली भी पढ़ी है ! क्या खूब लिखते हैं आप ! डॉ. बाली ने बताया था आपके विषय में और अगर ज्यादा गलत नहीं हूँ तो आपमें भी वाही गुण हैं जो आदरणीय डॉ. बाली में हैं ! बहुत खूब ग़ज़ल ! एक एक अश’आर , सुन्दर !

Sumit के द्वारा
May 12, 2012

आपकी इस रचना के बारे में, अब क्या कहे शाहीब http://sumitnaithani23.jagranjunction.com/2012/05/11/तानाशाही-मंच/

pritish1 के द्वारा
May 12, 2012

मुझे अच्छा लगा……….मैं जागरण junction मैं नया हूँ……..मेरे ब्लॉग मैं आपका स्वागत है………..आप मेरी कहानी “ऐसी ये कैसी तमन्ना” पढ़ सकते हैं…………..

nishamittal के द्वारा
May 12, 2012

मनोज जी आपकी रचना ने ये सोचने को विवश किया है की अपनी जिस संस्कृति का गुणगान हम करते हैं वो किस निम्न स्तर पर पहुँच रही है.

चन्दन राय के द्वारा
May 12, 2012

मनोज जी , ना कह पाने का भाव लेकर भी , आपने मित्र सब कुछ कह दिया सुन्दर रचना

dineshaastik के द्वारा
May 12, 2012

मनोज  जी देश  के हालात की बहुत ही सटीक   प्रस्तुति की है आपने। ये  हालात   बदलना होंगे , हम सबको सामूहिक  प्रयास  करके। सराहनीय   रचना के लिये  बधाई….. 


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