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पड़ा अकाल, बनाओ माल !! (व्यंग्य)

Posted On: 1 Aug, 2012 Others में

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कभी बुजुर्ग कहते थे कि भगवान जब देता है छप्पड़ फाड़ के देता है। अब जाकर उसका मतलब समझ में आया है। भगवान गरीबों का छप्पड़ फाड़ता है, तब अमीरों को देता है। कभी आपने सुना है कि भगवान जब देता है फ्लैट फाड़ के या फार्महाउस फाड़ के देता है? नहीं ना ! क्योंकि सूखा हो या बाढ़, छप्पड़ तो गरीबों का ही फटता है। आजकल देश में फिर से गरीबों के छप्पड़ फाड़ने का समय आया हुआ है। यानी कि देश में सूखा घोषित हो रहा है।
इससे जहां शासक वर्ग में खुशी कि लहर दौड़ रही है, वहीं शासित वर्ग को फिर से छप्पड़ फटने की चिंता हो रही है। सूखे के फायदे बहुआयामी हैं, बहुत ब्यापक हैं। हर वर्ग को सूखे से बहुत उम्मीदें हैं। मुख्यमंत्री जी इसलिए खुश हैं, कि अब सूखे से निपटने के लिए प्रधानमंत्री से बड़ा सा पैकेज लेंगे। और पैकेज खुले ना खुले, सारे नेताओं और मंत्रियों की किस्मत जरूर खुल जाएगी।
जिलाधिकारी मुंछों पर ताव दे रहे हैं कि जिले के लिए राहत पैकेज मिलेगा। और यह राहत पैकेज, सूखे में कहाँ सूख जाएगा, इसकी खबर भी किसी को नहीं मिलेगी। अफसर –मंत्री सूखे से खुश तो जरूर हैं, पर मलाल यह है कि अगर बाढ़ होती, तो हेलीकाप्टर से सैर (अरे नहीं नहीं, दौरा) करते। अब सूखे में कार से सड़क पर चलना पड़ेगा। अब ये लोग कोई सड़क छाप तो होते नहीं कि सड़क पर चलें। वैसे भी, वे तो जनता को सड़कों पर लाने में माहिर होते हैं।
हाँ तो बात चल रही थी खुशी की। प्रधानमंत्री सूखे के नाम पर बहुत से नए कर लगाएंगे। विश्व बैंक से सहायता लेंगे। और उसमें से कितनी सहायता स्विस बैंक पहुँच जाएगी, इसे तो रामदेव बाबा सात जन्मों में भी नहीं पता कर पाएंगे। और जनता के पास इस अकाल में, अन्न नहीं, सिर्फ अन्ना रह जाएंगे ।
छोटे छोटे दुकानदारों पर, सूखा सुनकर ही धन वर्षा होने लगती है। दुकानदार पहले ही सामानों का दाम बढ़ाकर, जनता का छप्पड़ फाड़ने लगते हैं। सूखे के नाम पर हर सामान का दाम बढ़ जाता है। चाहे वह खेत में पैदा हो या फैक्टरी में । अकाल सबका पड़ जाता है। वैसे अकाल में कुछ पैदा हो या ना हो, कुकुरमुत्ते की तरह एनजीओ जरूर उगने शुरू हो जाते हैं। इनकी नजर सरकार के राहत पैकेजों और जनता के चंदों पर ज्यादा, जनता की राहत पर कम होती है।
अकाल से सबसे ज्यादा फायदा तो पंडो-पुजारियों का होता है। कर्नाटक सरकार ने वर्षा होने के लिए यज्ञ –हवन करने के लिए पूरे राज्य में 17 करोड़ रुपये आवंटित किया है। कुछ समय पहले राजस्थान की वसुंधरा सरकार ने भी एसे ही टोटके किए थे। अब वर्षा हो या ना हो, पंडों-पुजारियों पर धन वर्षा तो होती ही है।
वैसे अकाल केवल पानी ना बरसने से नहीं होता। अकाल बहुत सी चीजों का हो सकता है। आजकल हमारे देश में बहुत तरह के अकाल पड़े हुये हैं। सबसे बड़ा अकाल तो ईमानदारी का है। सब तरफ भ्रष्टाचार की बाढ़ है। ईमानदारी का अकाल है। लोकतन्त्र में लोकहित का अकाल है। लोगों में सदाचार और संयम का अकाल है। अधिकारी में ज़िम्मेदारी का अकाल है। भाषणों-उपदेशों कि बाढ़ है, उन पर अमल का अकाल है। लेकिन क्या फर्क पड़ता है। हम लोग हर स्थिति का फायदा उठाने में माहिर हैं। इसीलिए तो कहते हैं, पड़ा अकाल- बनाओ माल।

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3 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

kpsinghorai के द्वारा
August 3, 2012

मनोज जी, अत्यंत सुंदर व्यंग्य रचना। शायद सत्ताधारियों के लिए भी जनता अब केवल हंसी-मजाक विषय रह गई है. जब चाहो उसका मजाक उड़ाओ और उसी के नाम पर खाओ………। जब हक मांगे तो डंडे खिलाओ। सब कुछ खाया जा चुका है। चारा से लेकर टूजी तक……….. । साभार…….

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
August 2, 2012

हमें तो पीने का बहाना चाहिए.

dineshaastik के द्वारा
August 2, 2012

मनोरंजन जी, सादर नमस्कार। रोचक, मनोरंजक एवं तीखा व्यंग…..बधाई…..


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