आईने के सामने

सामयिक मुद्दे पर लिखी गयी ब्यंगात्मक रचनाएं

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manojjohny


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बदलाव की बयार, सब बदल दो यार !! (ब्यंग्य)

Posted On: 22 Jan, 2015  
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बच्चे कितने अच्छे??? (व्यंग्य)

Posted On: 21 Jan, 2015  
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Entertainment Hindi Sahitya Others में

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गिरो, मगर प्यार से….(ब्यंग्य)

Posted On: 26 Jul, 2013  
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Hindi Sahitya Junction Forum Others हास्य व्यंग में

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हम उनको चाहते रहे, दिवानों की तरह……..

Posted On: 25 Apr, 2013  
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हर सौदे में परसेंटेज, जरूरी होता है……..

Posted On: 27 Feb, 2013  
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रेल बजट 2013

Posted On: 27 Feb, 2013  
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वाग्वीर इंसान की, होत चीकनी बात !!

Posted On: 25 Feb, 2013  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा: शालिनी कौशिक एडवोकेट शालिनी कौशिक एडवोकेट

के द्वारा: jlsingh jlsingh

आखिर पर्सेंटेज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है। पैदा होने से लेकर मरने तक पर्सेंटेज हमारा पीछा नहीं छोड़ता। बच्चा पैदा होने पर सबसे पहले यह देखता है कि वह कितनी परसेंट वाली जाति में पैदा हुआ। स्कूल गया तो, जब तक पढ़ेगा, पर्सेंटेज पीछा नहीं छोड़ता। माँ-बाप बेटे के पर्सेंटेज के पीछे हलकान रहते हैं। पढ़-लिखकर जब बच्चा नौकरी ढूंदेगा, तो फिर पुंछा जाएगा, ग्रेजुएशन में कितना परसेंट? पोस्ट-ग्रेजुएशन में कितना परसेंट? और अंत में पुंछा जाएगा, कितने परसेंट वाली कास्ट से हो? नौकरी करो तो बीबी-बच्चों को हर महीने पर्सेंटेज। मरने के पहले सबका पर्सेंटेज निर्धारित करके मरो। मतलब पूरी जिंदगी, पर्सेंटेज कभी पीछा नहीं छोड़ता। एकदम बढ़िया ! सुन्दर व्यंग्य !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

के द्वारा: PRADEEP KUSHWAHA PRADEEP KUSHWAHA

वैसे नेता-मंत्री तो पैदाइशी ‘वाग्वीर’ होते हैं, लेकिन आजकल हमारे देश में और भी बहुत से ‘वाग्वीर’ पैदा हो गए हैं। जैसे दिल्ली बलात्कार काण्ड पर बोलते हुये ऋषिवर श्री श्री 1008 आशाराम बापू महराज ने ‘बयान बम’ फोड़ दिया कि अगर पीड़ित लड़की की दीक्षा हुई होती, वह बलात्कारियों को भाई बोल देती, तो यह घटना ना होती। एक दूसरे श्री श्री 1008 ने दूसरा प्रवचन दिया, बलात्कार इंडिया में ज्यादा होता है, भारत में कम। इस मुद्दे पर अलग अलग वाग्वीरों ने अपने अपने ‘बयान बम’ फोड़े। हमारे देश में, एसे भी वीर हैं, जो अलग अलग मुद्दों पर ‘बयान बम’ फोड़ते रहते हैं। जिसमें श्री मार्कण्डेय काटजू और श्री दिग्विजय सिंह प्रमुख ‘बयान-बम बाज’हैं। गरीबी, महँगाई से पीड़ित जनता, कम से कम‘बयान बमों’के मजे लेकर कुछ देर के लिए ही सही, आनंदित हो जाती है। देश के एसे सपूत ‘वाग्वीरों’ को शत शत नमन!!! सही बात ! लेकिन क्यूंकि हम इन वाग्वीरों की बात को सुनते हैं और हाय तौबा मचाते हैं इसलिए ही ये वाग्वीर भोंकते हैं ! बढ़िया लेखन मित्रवर मनोज कुमार जी !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

के द्वारा: PRADEEP KUSHWAHA PRADEEP KUSHWAHA

हमारे देश में वेलेंटाइन का कम से कम इस बात के लिए तो विरोध होना ही चाहिए कि इसका टाइम फिक्स है। आखिर यह हमारी महान परंपरा के खिलाफ है। हमारे देश में, कोई भी प्रोजेक्ट हो, योजना हो, बांध हो, सड़क हो या पुल हो, कोर्ट का मुक़दमा हो, जब किसी भी काम के पूरा होने का समय कोई नहीं तय कर सकता, फिर प्यार का समय कैसे नियत हो सकता है? हम सब फ्लेक्सिबिल लोग हैं, हम लोगों के लिए वेलेंटाइन फिक्स नहीं होना चाहिए। आपने अपने आखिरी पैराग्राफ में भी बहुत सटीक बात लिखी है ! लेकिन ऐसा करना शायद न तो जनता को रास आएगा और न ही सांसदों को ! क्यूंकि अगर वो हो हल्ला नहीं करेंगे तो फिर करेंगे क्या ? उन्हें यही तो लगता है की उन्हें शायद इसी काम के लिए चुन गया है ! वैलेंटाइन के दिन के फेर में आपने नब्ज़ तक पहुँचाने की बात करी है ! बहुत सुन्दर आलेख ! मनोज जी , शायद ही कोई ऐसा लेख या रचना होगी आपकी जो मैंने नहीं पढ़ी ! यहाँ भी और अखबार में भी ! मस्त मस्त बात करते हुए आप व्यंग्य कास देते हैं ! गज़ब हैं आप

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

श्री मनोज कुमार जी , बहुत दिनों के बाद आपको पढ़ रहा हूँ और बहुत सटीक और तार्किक लेखन के साथ पढ़ रहा हूँ ! अच्छा लगता है जब आपके जैसा कोई व्यक्ति , कोई ब्लोग्गर इतनी स्पष्टता से अपनी बात कहता है ! बहुत कुछ कह दिया आपने ! ये हकीकत है की भारत में जाती बहुत मायने रखती है ! मकान किराये पर लेना होगा तब भी और कहीं कहीं नोकरी के माले में भी ! लेकिन भ्रष्टाचार को सीधे सीधे जाती से जोड़ देना , उचित नहीं लगता ! हालाँकि आप भी कहीं न कहीं मायावती जैसे भ्रष्ट व्यक्ति को अपनी तरफ से क्लीन चित देने की कोशिश कर रहे हैं ! जिसको जहां मौका मिल रहा है वो लूट रहा है वो चाहे उच्च वर्ग से हो या निम्न वर्ग से ! बहुत बढ़िया लेखन

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

मैं भी कृष्ण को महान मानता हूँ किन्तु उनके कुछ कृत्य मानवीय दृष्टि से क्षम्य नही ं हैं। हो सकता है कि मेरे विचारों से कोई सहमत न हो किन्तु मैं तार्किक कारणों से अपने विचारों पर अटल हूँ। दिनेश “आस्तिक” जी ..... आपने अपनी प्रतिकिर्या में जिन तार्किक कारण का उल्लेख किया है मैं तुच्छ प्राणी उनकी विस्तारपूर्वक व्याख्या जानना चाहता हूँ ताकि मेरा ज्ञानवर्धन हो सके और मैं अज्ञानी आपसे कुछ ज्ञान पा सकू ..... किरपा करके मेरा मार्गदर्शन कीजिये ..... उम्मीद है की आप मुझको निराश नहीं करेंगे ..... :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-P :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-) :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-? :-x :-) :-? :-x :-) :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-) :-P :-? :-x :-) :evil: ;-) :-D :-o :-( :-D (जोनी जी आपके व्यंग्य बाण पढ़ कर मजा आ गया - यकीं मानियेगा की यहाँ पर किसी भी प्रकार का कोई टैक्स नहीं है )

के द्वारा: Rajkamal Sharma Rajkamal Sharma

के द्वारा: manojjohny manojjohny

के द्वारा: ajaydubeydeoria ajaydubeydeoria

के द्वारा: PRADEEP KUSHWAHA PRADEEP KUSHWAHA

आदरणीय भूषण जी आपका बहुत बहुत आभार बहुमूल्य सलाह के लिए। आप जैसे लोग, अगर कोई सलाह दे रहे हैं,यह मेरी खुशकिस्मती है। इसे यथासंभव मैंने बदल दिया है। लेकिन आपसे सादर यह कहना चाहूँगा कि,  “दलित मसीहा उनसे मिलते, जिनको कहते मनुवादी हैं”  और “दलित मसीहा गले लगाते उनको, जो मनुवादी हैं”  में  बुनियादी फर्क है। दूसरी लाइन यह निर्णय देती है कि गले लगने वाली पार्टी मनुवादी है। जबकि पहली लाइन केवल इतना कहती है कि किसी पार्टी पर मनुवाद का आरोप लगाने वाली पार्टी उससे मिलती है, इसका मतलब यह नहीं कि वह पार्टी मनुवादी है, मैं एसा निष्कर्ष नहीं निकालना चाहता। शायद आप भी इससे सहमत हो। आपके इस स्नेह और सुझाव के लिए मैं हार्दिक आभारी हूँ।

के द्वारा: manojjohny manojjohny

के द्वारा: manojjohny manojjohny

के द्वारा: Rakesh Rakesh

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

के द्वारा: manojjohny manojjohny

प्रिय मनोज भाई जी ,.सादर नमस्कार मैं जब से इस मंच पर आया ,.तभी से आपको पढता हूँ ,...शुरू से हमारे बीच मधुर सम्बन्ध है ,..कामना है सदैव यह स्नेह बना रहे ,..आपसे एक शिकायत है ,..आप अपने ब्लाग पर प्रतिक्रियाओं का उत्तर नहीं देते हैं ,.. बाकी आपके विचारों से अधिकांश सहमत ही हूँ ,....आपका कहना है कि जनता को पहले सुधरना होगा ,....मुझे लगता है कि बिना खूंखार भेडिओं को टांगे जनता को सुधार पाना मुश्किल है ,.....हमारी सामजिक संरचना ही ऐसी है कि आम सात्विक उदाहरण केवल किताबी बात होती है ,...भले आदमी का सम्मान तो होता है ,..लेकिन जब उसे शक्ति की जरूरत होती है तो वो राक्षसों के पास होने से परिस्थितिवश सात्विक व्यक्ति भी राक्षस बन जाता है ,.... थप्पड़ कांड और अन्य बातों पर अपने मूरख विचार एक पोस्ट में देने की कोशिश की है ,..समय मिलने पर कृपया अवश्य देखें ,........आवश्यकता व्यवस्था परिवर्तन की है ,...एक दिन हो कर रहेगी ,..सबको आचरण बदलना होगा ,.जनता को भी ,..नेता को भी ........मैं मानता हूँ कि जनता को भ्रष्ट करने में नेताओं का सबसे बड़ा योगदान है ,.... ईश्वर प्रदत्त लेखन से हम सब एक दूसरे का उत्साह बढ़ाते हुए अपने सतत प्रयास करते रहें ,..यही मुझे ठीक लगता है ,..कुछ दिन पहले मुझे लगा कि अब ब्लागिंग छोड़ देनी चाहिए लेकिन समय पर मिली प्रेरणा से पुनः जाग्रत हुआ हूँ ,....आपकी वेब पर गया था ,...बहुत अच्छी लगी !..हार्दिक शुभकामनाओ सहित अभिनन्दन

के द्वारा: Santosh Kumar Santosh Kumar

आपने बिलकुल ठीक कहा पीयूष जी, आक्रोश के नाम पर कल इसी तरह के लोग हर उस व्यक्ति को भी इसी तरह मारने लग सकते हैं जो की इनके किसी भी कृत्य का विरोध करेगा……. अफसोस इस बात का है की आज इस व्यक्ति का समर्थन करने वालों का मतदान वाले दिन वोट या तो जाति या धर्म या क्षेत्र या फिर नोट के लिए पड़ेगा…… और या फिर कुछ बुद्धिजीवी उस दिन मतदान से ही दूरी बनाए रखेंगे…… मैं इसी का दूसरा पक्ष और रखना चाहूँगा, की इस घटना ने, बहुत से ज्वलंत मुद्दों से जनता और संसद को भटका दिया। शीतकालीन सत्र जारी है, इस समय में भी अण्णा लोकपाल की बात ना करके, थप्पड़ पर तरह तरह की प्रतिकृया दे रहे हैं, जनता महंगाई, भ्रष्टाचार, आदि को भूलकर शरद पवार के थप्पड़ से खुश है।

के द्वारा: manojjohny manojjohny

बहुत बढ़िया रचना........ इस घटना के प्रति अपनी असहमति मैं अपने ब्लॉग मे भी जता चुका हूँ…. वास्तव मे जिसे हम जनता का आक्रोश कह कर बढ़ावा दे रहे हैं…… वो अराजकता को बढ़ावा देने की बात है…. आप अगर कुछ सही कर रहे हैं तो भी आपके कई विरोधी खड़े हो जाते हैं…… जैसा की आप जानते ही है…. की इस बेईमान दुनिया मे ईमानदार व्यक्ति से अधिक दुश्मन किसी के नहीं होते है…. पुलिस के निर्ममता का एक कारण ये भी है की उसको अपराधियों के साथ मारपीट करते देखने के आदि हो चुके हम लोग जब किसी बेकसूर को भी पीटता देखते हैं तो बरबस ही ये मान लेते हैं की ये भी अपराधी ही होगा… और एक बेकसूर यूं ही पीट जाता है….. आक्रोश के नाम पर कल इसी तरह के लोग हर उस व्यक्ति को भी इसी तरह मारने लग सकते हैं जो की इनके किसी भी कृत्य का विरोध करेगा……. अफसोस इस बात का है की आज इस व्यक्ति का समर्थन करने वालों का मतदान वाले दिन वोट या तो जाति या धर्म या क्षेत्र या फिर नोट के लिए पड़ेगा…… और या फिर कुछ बुद्धिजीवी उस दिन मतदान से ही दूरी बनाए रखेंगे……

के द्वारा: Piyush Kumar Pant Piyush Kumar Pant

के द्वारा: manoranjanthakur manoranjanthakur




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